Wednesday, March 28, 2007

Uljhan



सभी चाहते हैं मेरा एक हिस्सा उनके लिये,
में कब पाऊँ कुछ अपने लिये

जीवन है मेरा,
किंतु महत्व किसी और का
विचार हैं मेरे,
परंतु आचार किसी और सा

तस्वीर बनाना चाहूँ
तो मन के रंग न भर पाऊँ
गीत गाना चाहूँ,
तो अपनी धुन न रच पाऊँ

कैद हूँ मैं,
जैसे एक अदृश्य से पिंजरे में
मेहंदी हूँ जैसे,
जीवन सार्थक है पिसने में

तोडना है मुझे,
इन बेडियों को अपने पाँव से
अर्थ पाना है खुद का,
सँसार कि धूप-छाँव में

सभी चाहते हैं मेरा एक हिस्सा उनके लिये,
में कब पाऊँ कुछ अपने लिये

Sabhee chhahte hain mera ek hissa unke liye,
Mein kab paaoon kuchh apne liye

Jeevan hai mera,
Kintu mahatv kisee aur ka
Vichaar hain mere,
Parantu aachaar kisee aur sa

Tasveer banana chaahoon,
To man ke rang na bhar
paoon
Geet gaana chaahoon,
To apnee dhun na rach paoon

Kaid hoon mein,
Jaise ek adrishya se pinjre mein
Mehndee hoon jaise,
Jeevan sarthak hai pisne mein

Todna hai mujhe,
In bediyon ko apne paanv se
Arth paana hai,
Khud ka, sansaar ki dhoop-chhaon mein

Sabhee chhahte hain mera ek hissa unke liye,
Mein kab paaoon kuchh apne liye

Thursday, March 22, 2007

एक मुट्ठी आसमान


छोटे छोटे टुकडों में बँटा हुआ है,
ऐसा लगता है जैसे कटा हुआ है,
लंबी लंबी ईमारतों के बीच में,
एक मुट्ठी आसमान ही मिला हुआ है।

ऊँची उडान भरते देखा नहीं,
सदियों से किसी पंछी को,
बस पार करते देखा है,
एक छोर से दूसरे तक,
अपने आसमान के टुकडे को।

बादलों का काफिला भी,
निकलता है थक थक के,
मेरे टुकडे में कभी कभार,
नज़र आता है ठहरा हुआ,
और फिर चल देता है रुक रुक के।

सूरज की क्या बात कहूँ,
बस झलक ही दिखलाता है,
दिन का एक ही पल है,
जो नाम मेरे कर के,
आँखों से ओझिल हो जाता है।

छोटे छोटे टुकडों में बँटा हुआ है,
ऐसा लगता है जैसे कटा हुआ है,
लंबी लंबी ईमारतों के बीच में,
एक मुट्ठी आसमान ही मिला हुआ है।

This poem is inspired by a comment my mom once made - something she doesn't get to see in Bombay is the vast open sky.

Thursday, March 08, 2007

Mrigtrishna


Jaane kyon man vichalit hai,
Kyon vicharon ka ufan aata hai,
Jab shant hai vatavaran saara,
Toh kyon man mein tufan aata hai?

Ek ladi si lag jaati hai khayaalon ki,
Jinka na aapas mein naata hai,
Samajhne ka karoon kitna bhi prayaas,
Kintu samajh mein kuch na aata hai.

Mrigtrishna si tadap hai ab,
Yeh baat kyonki jaanti hoon,
Who saare uttar bhi toh mere hi paas hain,
Jinke peeche anaayas hi bhaagti hoon…