Thursday, March 22, 2007

एक मुट्ठी आसमान


छोटे छोटे टुकडों में बँटा हुआ है,
ऐसा लगता है जैसे कटा हुआ है,
लंबी लंबी ईमारतों के बीच में,
एक मुट्ठी आसमान ही मिला हुआ है।

ऊँची उडान भरते देखा नहीं,
सदियों से किसी पंछी को,
बस पार करते देखा है,
एक छोर से दूसरे तक,
अपने आसमान के टुकडे को।

बादलों का काफिला भी,
निकलता है थक थक के,
मेरे टुकडे में कभी कभार,
नज़र आता है ठहरा हुआ,
और फिर चल देता है रुक रुक के।

सूरज की क्या बात कहूँ,
बस झलक ही दिखलाता है,
दिन का एक ही पल है,
जो नाम मेरे कर के,
आँखों से ओझिल हो जाता है।

छोटे छोटे टुकडों में बँटा हुआ है,
ऐसा लगता है जैसे कटा हुआ है,
लंबी लंबी ईमारतों के बीच में,
एक मुट्ठी आसमान ही मिला हुआ है।

This poem is inspired by a comment my mom once made - something she doesn't get to see in Bombay is the vast open sky.